Friday, April 30, 2010

नरेन्द्र मोदी के ब्लॉग से: अर्ध शताब्दी की पुरुषार्थ यात्रा

प्रिय मित्रों,

आज पहली मई है, गुजरात का स्थापना दिवस.

गुजरातियों की ५० साल – अर्ध शताब्दी की पुरुषार्थ यात्रा.

गुजरात की स्थापना के लिए कई होनहार युवाओ ने शहादत को गले लगाया.

कई पीढ़ियोंने गुजरात की प्रगति के लिए अपनी जवानी न्योच्छावर कर दी.

अकाल हो, बाढ़ हो, चक्रवात हो या भूकंप हो – ऐसी कई आपदाओं का न केवल सामना कीया बल्की हर बार आपदा को अवसर में परिवर्तित भी कर दीया.

गुजरात की विकास यात्रा कई बार राजनीतिक कूटनीति का शिकार भी बनी, परंतु राजनीतिक इच्छा शक्ति से विकास की गाड़ी पटरी पर वापस आई एवं पूरी रफ्तार से आगे बढ रही है.

गरीब से गरीब आदमी हो, साक्षर हो या अनपढ़, शहरी हो या ग्रामीण, पुरुष हो या महिला हो, युवा हो या वरिष्ठ हो – हर एक गुजरातीने गुजरात को आगे बढाने में कुछ ना कुछ योगदान दिया है.

गुजरात को प्यार करने वाले सब का आभार व्यक्त करने का यह अवसर है.

मैं ...

गुजरात के लीये जीने वाले

गुजरात के लीये झुझने वाले

गुजरात के लीये पुरुषार्थ करने वाले

सभी का

दिल से

धन्यवाद करता हुं.

जनता जर्नादन भगवान का रूप है. स्वर्ण जयंती के पावन अवसर पर, जनता मुझे आशीर्वाद दें, अधिक से अधिक शक्ति से, परिश्रम से, निष्ठापूर्ण तरीके से आप सबका साथी बनके, मैं आपकी सेवा में सक्रिय रहुं – और आप सबने सौंपी हुई जिम्मेदारी अच्छी तरह से निभा सकुं.

माँ गुर्जरी को वंदन

माँ भारती को वंदन

जय जय गरवी गुजरात.

जय जय स्वर्णिम गुजरात.

comments

Read more...

Friday, April 2, 2010

खुदा के लिए त्योंहार मनाना बन्द करो, नहीं तो हम करवा देंगे

वर्तमान में जल्दी जल्दी कई स्थानों पर दंगे हुए जिनमें एक खास प्रकार का समीकरण सामने आया है। ये घटनाएँ हैं महाराष्ट्र के मेराज, उत्तर प्रदेश के बरेली तथा आंध्रप्रदेश के हैदराबाद की।

इन तीनों ही जगहों पर हिन्दू उत्सवों के समय फसाद हुए है। इनमें मेराज के गणेशोत्सव, बरेली में राम-बरात व हैदराबाद में हनुमान जयंती के उत्सव पर दंगा भड़का कर बाधा डाली गई। इन सभी जगहों पर कथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों की सरकारें हैं। (इससे सम्बन्धित समाचार यहाँ देखें)

एक समय था जब गुलाम भारत पर मुगलों का शासन था, तब दीपावली जैसे त्योंहार भी मनाने पर प्रतिबन्ध था। अब जहाँ जहाँ मुस्लिम आबादी ठीकठाक है वहाँ दंगा-फसाद कर हिन्दुओं को त्योंहार मनाने से रोका जा रहा है। हमारी सेक्युलर सरकार व परम सेक्युलर मीडिया इस मामले में चुप है।

सोचिये हमारी संतानों के लिए हम कैसा भारत छोड़ कर जाने वाले है? क्या वे अपने त्योंहार मना पाएंगे? या फिर उन्हे जरूरत ही नहीं पड़ेगी क्योंकि वे हिन्दु रहेंगे ही नहीं। जिसकी दुहाई दी जा रही है उस संस्कृति को दफना दिया जाएगा क्योंकि गंगा को जमुना निगल लेगी।

Read more...

Thursday, April 1, 2010

उलटे पड़ते दावे

गुजरात दंगा पीड़ितों और उनके लिए लड़ने वालों का दर्द जानना हो तो इसे जरूर पढ़ें. ये इंडिया-टुडे के ताजा अंक में छपे लेख की तस्वीरें है. क्लिक कर पढ़ें.

हिन्दी में पढ़ें:

From india-today


From india-today


अंग्रेजी में पढ़ें:

From india-today


From india-today


From india-today


(देशहित में इंडिया टूडे से साभार)

Read more...

आर.जगन्नाथन: भारतीय धर्मनिरपेक्षता का खोखलापन

विशेष जाँच दल [SIT] के द्वारा नरेन्द्र मोदी की हुई पूछताछ के मीडिया कवरेज और अमिताभ बच्चन विवाद से भारतीय धर्मनिरपेक्षता का खोखलापन उजागर होता है. SIT के द्वारा मोदी को मात्र पूछताछ के लिए बुला लिए जाने से आत्ममुग्ध होने तथा 21 मार्च को उनके ना जाने से उपजी बौखलाहट से सिद्ध होता है कि कथित धर्मनिरपेक्षकों को न्याय से कोई सरोकार नहीं है, परंतु अपने निजी स्वार्थों से जरूर है.

भारत के पाखंडी धर्मनिरपेक्षकों ने क्षुद्र राजनीतिक कारणों की वजह से धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या का निजीकरण कर लिया है. धर्मनिरपेक्षता का अर्थ अब जो भी “संघ परिवार” की मान्यता हो उसका विपरित – ऐसा बना दिया गया है. जिस तरह से पाकिस्तान खुद को “भारत के विपरित” व्याख्यायित करता है, उसी तरह से धर्मनिरपेक्ष लोग खुद को “संघ परिवार से विपरित” के रूप में व्याख्यायित करते हैं. वे संघ को “दूसरे लोग” मानकर खुद को छलावा देते हैं.

मोदी पर कई बार आरोप लगते हैं – जो कुछ हद तक वैध भी हैं – कि वे अपने राज्य के हित को खुद के हित से जोड़कर देखते हैं. परंतु उनके आलोचक खुद उनके ही हाथों खेल रहे हैं. जब अमिताभ बच्चन को राज्य प्रवासन का ब्रांड अम्बेसडर बनने का न्यौता दिया गया तो उनपर अशिष्टता का आक्षेप लगा दिया गया. उनको आमंत्रण देने के पीछे मोदी का राजनीतिक एजेंडा हो सकता है, परंतु क्या सभी राजनेता ऐसा नहीं करते? क्यों ऐसा है कि, जो भी गुजरात को बढावा देने का प्रयत्न करता है वह धर्मनिरपेक्षकों के हमले का शिकार हो जाता है? यह वैचारिक उत्पीडन है.

अगर मोदी खुद को राज्य के रंग में रंग रहे हैं, तो “धर्मनिरपेक्ष” लोग अपनी निरी मुर्खता के साथ उनकी मदद कर रहे हैं. जो कोई भी राज्य के द्वारा नियुक्त किया जाता है उस पर प्रहार करके वे यह बात साफ तौर पर कह रहे हैं कि गुजरात के लिए काम करने का अर्थ मोदी के लिए काम करना है. इसलिए जब मोदी यह कहते हैं कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतें गुजरात की अस्मिता को कुचल रही है तो सब उन पर भरोसा करते हैं.
अंधा विरोध कभी भी अच्छा नहीं होता. 2007 के गुजरात चुनाव से पहले, जयराम रमेश ने कहा था कि मोदी के नैतृत्व में राज्य के औद्योगिक विकास के पीछे मोदी का कम बल्कि गुजरातियों की औद्योगिक क्षमता का अधिक योगदान है – यह कुछ हद तक सही हो सकता है. लेकिन फिर यह कहना भी गलत नहीं होगा कि यूपीए सरकार के द्वारा हासिल औद्योगिक विकास ज्योर्ज बुश के वैश्विक विकास इंजिन की मदद से लोगों के द्वारा हासिल किया गया विकास है.

परंतु वंशवाद के समर्थक, रमेश, में इतनी हिम्मत नहीं होगी की वे इसे स्वीकार कर सकें. परंतु मोदी की उपलब्धियाँ दुषित की जाती रही हैं.

यह देखना भी कुत्सित लगता है कि मोदी का अनादर होने का कोई भी मौका देखते ही धर्मनिर्पेक्षकों के मूँह में पानी आने लगता है – जबकि उनकी प्राथमिकता न्याय होनी चाहिए. कोई इस बात का संज्ञान नहीं लेता कि बोफोर्स मामले में कभी भी राजीव गांधी को जवाब देने के लिए नहीं बुलाया गया था जबकि यह एकदम स्पष्ट था कि वे तथा उनके नजदीकी इस मामले से जुडे अघोषित संदिग्ध थे. बोफोर्स केस से जुड़े एक स्वीडिश अभियोक्ता ने आश्चर्य भी व्यक्त किया था कि इस घोटाले के लिए सोनिया गांधी से पूछताछ क्यों नहीं की गई – जबकि ओत्तेवियो क्वात्रोकी के साथ उनके भी संबंध थे. क्या यह आश्चर्य की बात हो सकती है कि क्वात्रोकी यूपीए शासन के दौरान चुपचाप निकल गए.

यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने 1984 के सिख विरोधी दंगों के लिए खेद व्यक्त किया था जबकि मोदी ने चुप्पी बनाए रखी. अपने आप से पूछिये: एक सीख प्रधानमंत्री द्वारा अपनी पार्टी द्वारा की गई सिख विरोधी तबाही के लिए माफी माँगना क्या वास्तव में कोई मूल्य रखता है? ऐसी क्षमा याचना से कोई फर्क नहीं पड़ता. बाबरी विध्वंस के लिए लालकृष्ण आडवाणी द्वारा “मेरे जीवन का सबसे दुखद दिन” वाली विलम्बित क्षमायाचना धर्मनिरपेक्षतावादियों लिए काफी नहीं थी, लेकिन 1984 के 20 साल बाद मनमोहन सिंह की माफी पश्चाताप का एक अद्भुत उदाहरण बन जाती है!

बच्चन प्रकरण का जहाँ तक प्रश्न है, सेक्युलर दलों के द्वारा उन्हे क्षमा मिलने की कोई सम्भावना नहीं है. वास्तव में तो वे दुगने दोषी है. निश्चित रूप से उनका पहला अपराध था कि वे गुजरात के लिए बल्लेबाजी करने में उतावलापन दिखा गए और उनका दूसरा अपराध था कि वे गांधी परिवार की नजरों में गिर गए थे. दोनों कारणों को मिलाकर देखें, तो उन्हे बख्शा नहीं जा सकता. यही कारण है कि कांग्रेस पार्टी के मूर्ख तत्व उनसे सभी प्रकार के स्पष्टीकरण मांगने में व्यस्त हैं, जबकि रतन टाटा, मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी – जैसे व्यापारियों – जिन्होनें सीधे सीधे मोदी की प्रशंसा की थी – की तरफ किसी का दूर दूर तक ध्यान नहीं गया. यह बात अमिताभ ने अपने ब्लॉग में भी लिखी है.

मोदी को 2002 के दौरान उनके द्वारा किए गए या ना किए गए कार्यों के लिए सजा नहीं मिलनी चाहिए या अभियोग नहीं लगाना चाहिए यह कोई तय नहीं कर सकता है. परंतु उनपर मीडिया के द्वारा पहले से ही अभियोजन लग चुका है और उन्हें दोषी भी मान लिया गया है. यदि यह भी मान लिया जाए कि 8 साल पहले जो कुछ भी ऐसा जो अवर्णीय है वह राज्य में हुआ और उस पर यह काव्यात्मक न्याय करने की शैली है तो भी, यह एक पक्षीय धर्मनिरपेक्षता का बहाना नहीं बन सकती.

हैंस क्रिश्चियन एंडरसन (Hans Christian Andersen) की अमर कथा में उल्लेख किया गया है कि कैसे एक मासूम बालक एक सम्राट को बताता है कि उसने कपड़े नहीं पहन रखे हैं. सम्राट के दर्जियों के द्वारा उसे बताया जाता है कि उन्होनें सम्राट के लिए दिखाई ना देने वाले कपड़े बनाए हैं. ये कपड़े उन लोगों को नहीं दिखेंगे जो “मूर्ख” होंगे. चुँकि सम्राट खुद को “मूर्ख” के रूप में चिह्नित किया जाना नहीं चाहता है, इसलिए वह ऐसा प्रदर्शन करता है मानो उसने कपड़े पहन रखे हैं जबकि वह एकदम नग्न होता है.

ऐसा लगता है कि “धर्मनिरपेक्ष” लोग भी एकदम नग्न हैं – और उन्हें इसका कोई आभास ही नहीं है.

(यह लेख जगन्नाथन के अंग्रेजी लेख जो डी.एन.ए. में कॉलम के रूप में छपा था, का हिन्दी अनुवाद है)

Read more...

Tuesday, March 30, 2010

नरेन्द्र मोदी के ब्लॉग से : गुजरात विरोधियों को बख्शा नहीं जाएगा

मित्रों,

मेरे कल के ब्लॉग में मैने नई अस्पृश्यता के तालेबान शब्द का प्रयोग किया था। मेरा स्पष्ट मत है कि सार्वजनिक जीवन में किसी प्रकार की छुआछूत या अस्पृश्यता के लिए स्थान नहीं होना चाहिए।

मेरे ब्लॉग में मैंने किसी भी पार्टी या व्यक्ति का नाम नहीं लिखा, फिर भी कॉंग्रेस जैसी पार्टियों ने पूरी बात को अपने सर पर ले लिया। कॉंग्रेस ने ऐसा क्यों किया होगा? यह बात जनता को सोचनी चाहिए।

कॉंग्रेस के मित्रों ने कल गुस्से मे आकर अनाप-शनाप बयान दिए लेकिन उस मामले में मैं वक्त बर्बाद नहीं करना चाहता।

कॉंग्रेस ने श्री अमिताभ बच्चनजी से पूछा है कि वे गुजरात के साम्प्रदायिक दंगों का विरोध करते है या नहीं ? मित्रों, मोदी स्वयं दंगों का विरोध करता है। प्रत्येक नागरिक को दंगों का विरोध करना ही चाहिए।

१९८४ के दिल्ली दंगे हों, १९९२ के मुंबई दंगे हों, १९८५के गुजरात दंगे हों, कश्मीर में जारी अत्याचार हो या फिर गोधरा वाले दंगे हों। दंगों के लिए अलग- अलग तराजू नहीं हो सकते।

मित्रों,

गुजरात में वर्ष-२००२ में दंगे जारी थे, उन दिनों में गुजरात विधानसभा में मार्च २००२ में मेरे दिये वक्तव्य का एक पैराग्राफ में यहां लिख रहा हूं। दिन-रात झूठ फैलाने वालों के लिए इतना प्रमाण काफी है।

"क्या हम सभी को आत्म-चिंतन करने की आवश्यकता नहीं है? घटना गोधरा की हो या गोधरा के बाद की हो, किसी भी समय समाज को यह शोभा नहीं देती। यह घटनाएँ मानवता के लिए कलंक है। यह ऐसी घटनाएँ नहीं हैं जिससे किसी का सिर ऊंचा हो, तो फिर इस में मतभेद कैसा?"

वर्ष २००२ के मार्च महिने में दंगों के दौरान विधानसभा सदन में दिया गया मेरा वक्तव्य देश और दुनिया को सत्य बताने के लिए पर्याप्त है।

मित्रों,

२७ फरवरी २००२ को गोधरा में हृदय-विदारक घटना हुई और २८ फरवरी २००२ को दोपहर में मैने दूरदर्शन पर शांति की अपील की थी जो गुजराती में थी। मै इसे आपके समक्ष रख रहा हूं:

http://www.youtube.com/watch?v=BIRMR8zW0iI

(मेरी यह वीडियो अपील दूरदर्शन तथा आकाशवाणी पर लगातार प्रसारित होती रही तथा कई दिनों तक इसका प्रसारण जारी रहा।)

इस अपील को अक्षरसः शब्द लेखन:

गुजराती :

http://www.narendramodi.com/Any-unsubstantiated-criticism-of-Gujarat-can-never-be-tolerated,-come-what-may-gujarati.pdf

हिन्दी :

http://www.narendramodi.com/Any-unsubstantiated-criticism-of-Gujarat-can-never-be-tolerated,-come-what-may-hindi.pdf


उस दिन की मेरी दर्दभरी अपील आज इतने वर्षो के बाद भी गुजरात को बदनाम करने वाले बहरे कानों को सुनाई देगी इसकी मुझे तनिक भी आशा नहीं है।

मित्रों

गांधी,सरदार की भूमि गुजरात का अन्ध विरोध किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। गुजरात मुँहतोड़ जवाब देगा और देकर रहेगा।


(नरेन्द्र मोदी के ब्लॉग से साभार, कृपया वहीं पर जाकर टिप्पणी भी करें)

Read more...

Sunday, March 28, 2010

SIT ने बनाया मि. पोप्युलर

राजनीतिक रूप से खत्म कर देने की षड्यंत्र रूपी वर्तमान घटनाओं ने नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता को गुजरात में फिर से बढ़ा दिया है। इस बात के प्रमाण आइपीएल के मैच के दौरान सरदार पटेल स्टेडियम में मिले. रविवार को हुए मैच के अंत में जब मोदी दिखे तो स्टेडियम में "मोदी-मोदी-मोदी" के नारे गुँजते सुनाई दिये. मोदी ने अनेक बार हाथ हिलाकर जन समूह का अभिवादन स्वीकार किया।

यह सब प्रताप है, सीट के समक्ष उपस्थित होने और उस पर मीडिया की बकवास करने का तथा अमिताभ बच्चन जो गुजरात के ब्रांड एम्बेस्डर है, उनके के साथ कॉंग्रेस द्वारा अछूत सा व्यवहार करने का।

किसी के पेट में दर्द उठा क्या?

Read more...

Monday, March 22, 2010

नरेन्द्र मोदी का खूला पत्र

मेरे प्रिय देशवासियों !

सादर नमस्कार |

आप इस सच्चाई से अच्छी तरह वाक़िफ़ है कि पिछले आठ वर्षो से कृत्रिम मामले बनाकर मुझ पर तरह-तरह के मनघडंत आरोप लगाने का फैशन सा हो गया है | पिछले एक सप्ताह से जो अफवाहें, आरोप ओर झूठ फैल रहे है, इनकी गहराई में उतरें तो दूध का दूध ओर पानी का पानी हो जाएगा | सत्य हमेशा सीमाएं तोड़कर भी बाहर आता है | यह सत्य क्या है इसका ताज़ा उदाहरण आपके समक्ष रखने की मुझे जरूरत आन पडी है |

वर्ष २००२ की गोधरा घटना के बाद गुजरात विधानसभा सदन और सार्वजनिक रूप से अनेक बार मैने बयान दिया है कि भारत का संविधान और कानून सर्वोपरि है | कोई भी नागरिक, चाहे वह मुख्यमंत्री हो तो भी कानून से ऊपर नहीं है | मैं इस वास्तविकता को सिर्फ शब्दों से ही नही बल्कि सच्ची भावना (इन टू स्पिरिट) से आज तक निभाता आया हुं और भविष्य में भी इसी भावना से निभाने के लिए प्रतिबंध हूँ |

इसके बावजूद कई स्वार्थी तत्व, बिना तथ्य के मन-घडंत और अनुमानों के आधार पर गुजरात को, मेरी सरकार को और स्वयं मुझे बदनाम करने का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देते |

हाल ही मे "SIT का नरेन्द्र मोदी को समन्स" जैसी ख़बरें फैलाकर मोदी SIT के समक्ष उपस्थित नहीं हुए ओर मोदी ने सुप्रीम कोर्ट तथा SIT का अनादर किया और मोदी ने तय तारीख पर अनुपस्थित रह कर SIT का अनादर किया जैसा आधारहीन और मन-घडंत दुषप्रचार करके फिर एक बार गुजरात को बदनाम किया जा रहा है | इसलिए मजबूरी में देशवासियों को इस सार्वजनिक पत्र द्वारा सच्चाई बता रहा हुं |

सच्चाई :
• अखबारों की रिपोर्ट के मुताबिक SIT ने मुझे बुलवाया है, इसकी जानकारी मिलते ही सरकार के अधिकृत प्रवक्ता ने तत्काल ही बयान जारी किया कि नरेन्द्र मोदी संविधान के पालनकर्ता है ओर कानून की प्रत्येक प्रक्रिया में सहयोग देते रहे है तथा देते रहेंगे |
• SIT ने समन्स भेजकर २१ मार्च २०१० को नरेन्द्र मोदी को बुलवाया है यह झूठ किसने शुरू किया ओर किस लिए शुरू करवाया, यह गंभीर जांच का विषय है |
• २१ मार्च २०१० को रविवार था ओर इस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है | अफवाह फैलाने वाले मित्रों ने इतनी सी प्राथमिक जानकारी हासिल करने की जरूरत नहीं समझी |
• सर्वोच्च न्यायालय के प्रतिनिधि के रूप में कार्यरत स्पेश्यिल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) के अधिकारीगण २१ मार्च २०१० को गुजरात में थे या नहीं इसकी प्राथमिक जानकारी हासिल करना भी इन झूठ फैलाने वाले मित्रों को मुनासिब ना लगा |
• देशवासियों को मैं विनम्रता से बताना चाहता हूँ कि मेरे उपस्थित होने के लिए २१ मार्च २०१० की तारीख तय नहीं की गई थी, इसलिए SIT में २१ मार्च को मुझे बुलाया गया था, यह बात बिलकुल झूठी है की मैं सर्वोच्च अदालत द्वारा नियुक्त संस्था के गौरव तथा कानून का आदर करके को संपूर्ण सहयोग दूँगा.

२१ मार्च २०१० तो कुछ स्वार्थी तत्वों की खोज थी तथा इसी के तहत कानून की निर्धारित प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया गया था की वह ऐसा चाहते थे कि में SIT को कोई तवज्जो नहीं देना चाहता, ऐसी स्थिति का निर्माण हो |


पिछले २४ घंटे से देश में इस मन-घडंत जानकारी के दुष्प्रचार का अभियान ऐसा चला कि कई प्रचार माध्यम भी उसके साधन बन गये मुझे आशा है कि अब ऐसा माध्यम भी सच्चा ओर सुधारात्मक अभिगम अपनाएंगे |

प्यारे देशवासियों,

वर्ष २००२ से गुजरात को लगातार बदनाम कर रहे इन तत्वों को गुजरात और देश की जनता अच्छी तरह पहचानती है लेकिन मुझे यह सत्य कहना है कि तरह तरह की अफवाह ओर झूठ फैलाकर जनता को उत्तेजित करने का पाप लोकतंत्र की समग्र प्रक्रिया में अवरोधक बनता है | पिछले २४ घन्टे के इस पूरे घटनाक्रम को देखते हुए, यह झूठ फैलाने और मुझे बदनाम करने का षड्यंत्र नजर आ रहा है | स्वार्थी तत्वों और विभिन्न परिबलो की आपस में कैसी सांठ-गाठ है यह स्वयं ही सार्वजनिक हो गया है|

गोधरा और गोधरा घटना के बाद की घटनाओं के लिए गुजरात सरकार हमेशा जांच आयोगों , जांच एजेंसियॉ और सर्वोच्च न्यायालय-सभी की न्यायिक प्रक्रिया का आदर करती रही है और इसलिए ही इस विषय पर किसी भी मामले ओर बयानों के साथ जुड़ना राज्य सरकार ने उचित नहीं समझा | समग्र जांच हमेशा न्यायिक स्तर पर बिना के चलाती रहे इसलिए झूठ ओर बदनामी सहकर भी राज्य सरकार ने मौन रखना ठीक समझा है |

अब जब पिछले २४ घंटे का घटनाक्रम झूठ की पराकाष्ठा को पार कर चुका है तो सिर्फ सच्चाई क्या है यह देशवासियों को बताना मैने अपना कर्तव्य समझा है |

मुझे आशा है कि इस सत्य का भी दुरुपयोग करके जांच प्रक्रिया को निहित स्वार्थो के लिए गुमराह करने की कोशिश नहीं की जाएगी और प्रचार माध्यम भी मेरी इस वेदना और भावनाओं को लोगों तक पहुँचाएंगे |

धन्यवाद



(www.narendramodi.in से साभार)

Read more...

Friday, October 2, 2009

क्योंकि रेवती हिन्दू थी, इसलिए प्रधान मंत्री की नींद नहीं उड़ी

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ब्रिटेन में दो भारतीय मुस्लिम डाक्टरों के आतंकवादी गतिविधियों में पकड़े जाने पर मार्मिक अपील में ऐसी घटनाओं का पूरे समाज और कौम की गलत छवि बनाने के लिए इस्तेमाल न करने के लिए कहा। ये समाचार भी आए कि ऐसी बातों से उनको नींद नहीं आई। सवाल पूछा जा सकता है कि जब भारत के पढ़े- लिखे और सुसंस्कृत मुस्लिम वर्ग के लड़के भी अलकायदा की गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं तो यह वक्त उनकी नींद उड़ाने का क्यों नहीं बनता जो समाज में मजहब के नाम पर हिंसाचार कर रहे हैं? प्रधानमंत्री की नींद कश्मीर घाटी से उजाड़ दिए गए हिन्दुओं का दर्द देखकर नहीं उड़ी, रामसेतु तोड़े जाते समय अकुलाहट नहीं हुई, संसद की रक्षा में शहीद हुए वीरों के परिजनों ने जब अलंकरण लौटाए, तब उनकी नींद नहीं उड़ी। सेकुलर होने का अर्थ हिन्दू हनन पर सन्नाटा ओढ़ना और गैर हिन्दू की हर गतिविधि पर संवैधानिक सत्ता की नींद उड़ाना क्यों हो गया है? ब्रिटेन में दो भारतीय डॉक्टरों द्वारा ग्लासगो हवाई अड्डे पर आत्मघाती हमले की योजना क्रियान्वित करने के समाचार के साथ-साथ मलेशिया में हिन्दुओं के इस्लाम में जबरन मतांतरण के समाचार भी छपे। लेकिन ब्रिटेन की घटना पर नींद उड़ती है और मलेशिया में हिन्दू हनन पर नींद गहरी हो जाती है।

मलेशिया में रेवती मसूसाई को 180 दिन इस्लामी जेल में बंद रखने के बाद पिछले सप्ताह छोड़ा गया तो 6 जुलाई को उसके बयान देश विदेश में समाचार एजेंसियों द्वारा प्रसारित किए गए। इस बयान में रेवती ने दिल दहलाने वाले अनुभवों का वर्णन किया है। उसे इस्लामी जेल में मुल्लाओं ने जबरन गोमांस खिलाने की कोशिश की। उसके नागरिकता पहचान पत्र से उसका मजहब "इस्लाम" काटकर "हिन्दू" लिखने से इस्लामी शरीयत अदालत ने मना कर दिया, उसकी 18 महीने की बच्ची को जबरन उसके पति से ले जाकर रेवती के बूढ़े माता-पिता के पास रखा, जो मुस्लिम हैं। ताकि उस हिन्दू दम्पत्ति की बेटी को मुस्लिम के नाते पाला पोसा जाता रहे। रेवती की दादी हिन्दू थीं। माँ शादी के बाद मुसलमान हो गईं। रेवती का लालन-पोषण उसकी दादी के यहाँ हुआ इसलिए वह हिन्दू हो गई। पर मलेशिया में कानून है कि मुस्लिम माता-पिता की संतान अपना मजहब नहीं बदल सकती। रेवती का एक हिन्दू युवक से विवाह हुआ। उन्होंने अपनी बच्ची का नाम भी हिन्दू ही रखा। पर इस्लामी अदालत ने इस विवाह को भी अवैध ठहराते हुए रेवती को इस्लामी "सुधारगृह" में गिरफ्तार कर भेज दिया गया जहाँ 180 दिनों में उस पर भीषण दबाव डाला गया कि वह स्वयं को मुस्लिम घोषित कर दे। पर रेवती की निष्ठा और हिम्मत की प्रशंसा करनी चाहिए उसने अपनी अंतरात्मा की आवाज के खिलाफ जाने से इनकार कर दिया। रेवती को अकेली कोठरी में रखा गया, उसे धमकाया गया कि अगर वह स्वयँ को मुस्लिम घोषित नहीं करेगी तो उसकी बच्ची को हमेशा के लिए उससे अलग कर दिया जाएगा। यह सब रेवती को इसलिए सहन करना पड़ा क्योंकि वह हिन्दू के नाते जीना चाहती है लेकिन सरकार और इस्लामी अदालत उसे मुसलमान बनाने पर तुले हैं।

रेवती की व्यथा पर भारत के वे मानवाधिकारवादी संगठन भी चुप हैं जो कश्मीर में आतंकवादियों की वकालत करते हैं और अफजल की माफी के लिए प्रदर्शन करते हैं। रेवती की पीड़ा उन महिला संगठनों को भी व्यथित नहीं कर रही है जो फिलिस्तीन, नेपाल और अफ्रीका में महिला मुक्ति पर सेमिनार करते हैं लेकिन स्वदेशी, स्वधर्मी महिलाओं की व्यथा उन्हें चोट नहीं पहुँचाती।

क्या यह सन्नाटा इसलिए है क्योंकि रेवती हिन्दू है और अत्याचार करने वाले मुसलमान?

पीड़ा और वेदना का न कोई रंग होता है न मजहब। इस्लाम परस्त सेकुलर तालिबानों को स्वयं से यह सवाल पूछना चाहिए कि जो मुसलमान सलमान रश्दी को ब्रिटिश सरकार द्वारा नाइटहुड यानी सर की पदवी दिए जाने से इसलिए खफ़ा हैं क्योंकि रश्दी को इस्लामी विरोधी लेखक के नाते मुस्लिम जगत में कुख्यात कर दिया गया है और उसकी हत्या का फतवा अभी भी वैध माना जाता है, वही मुसलमान अपनी ही मुस्लिम बिरादरी के एक व्यक्ति एम.एफ. हुसैन द्वारा हिन्दू देवी-देवताओं के नग्न चित्र बनाने पर चुप क्यों रहते हैं? हुसैन अपनी इस हरकत से सेकुलर तालिबानों की वाहवाही लूटता है और वे इस्लामी संगठन जो रश्दी के सम्मान पर क्रुद्ध होते हैं, हुसैन के हिन्दू विरोधी चित्रों की प्रशंसा करते हैं।

मूलभूत मान्यता यह होनी चाहिए कि किसी भी आस्था और मत पर प्रहार करना उचित नहीं है और यदि ऐसा जानबूझकर किया जाता है तो उसके विरोध में लोकतांत्रिक ढंग से आवाज उठानी चाहिए। लेकिन जिस प्रकार की विकृत वोट बैंक राजनीति और मुस्लिम तुष्टीकरण को सेकुलरवाद का जामा पहना दिया गया है उससे यथार्थ सेकुलरवाद अर्थात् बहुलता का सम्मान और सर्वपंथ समभाव को ही चोट पहुंचती है। उधर रेवती मसूसाई अपने हिन्दुत्व की रक्षा के लिए मलेशिया में अकेले लड़ाई जारी रखे हुए है, उसका साथ कौन देगा?

भारत के मानवाधिकारवादी संगठन हों या धार्मिक संगठन, वे अपने ही देश में रेवतियों की रक्षा नहीं करने में कितने सफल हैं, कोई क्या बताए। कश्मीर के हिन्दुओं की दर्दनाक दास्तान फिल्मों, कहानियों, उपन्यासों और प्रदर्शनियों का विषय बनी लेकिन इन सबसे कश्मीरी हिन्दुओं को क्या राहत और सांत्वना मिली? इसी प्रकार मुस्लिमों के लिए आरक्षण, हिन्दुओं के मतांतरण का पोप प्रेरित अभियान और हिन्दू मंदिरों के तथाकथित सुधार के लिए नास्तिक कम्युनिस्टों के प्रहारवादी प्रयास बदस्तूर जारी ही हैं। हिन्दू क्या कर रहे हैं सिवाय शिकायतों के बही खाते भरने के? इसलिए रेवती को समझना होगा कि अगर वह हिन्दू है तो उसे अपनी लड़ाई अपने बूते पर ही लड़नी होगी।

लेखक: तरुण विजय
(पाञ्चजन्य से साभार)

Read more...

Saturday, June 20, 2009

इन्हे भी सम्मन भिजवाईये माननीय दिनएश रॉय द्विवेदी ...

अरूण जी तो आपकी सिरफ़िरे वकीलों की सम्मन वाली लगातार आ रही मेलो से तंग आकर अपना ब्लोग मिटा कर चल दिये .आपके चेलो ने टिप्पणी भी की, की आपकी चिरकुट मंडली से घबरा कर टाप टेन ब्लोगर अपना ब्लाग डीलीट करने लगे है.लेकिन हम आपको बता दे कि अरूण जी ना तो घबराये थे ना ही डरे थे. अरूणजी तो देखने में लगे थे कि जब कोई आदमी वकालत पास कर लेता है तो उसके अंदर इन्सानियत कितनी समाप्त हो जाती है. अपने अलावा वो किसी की सुनने को राजी होता भी है या सिर्फ़ अपनी ही सुनाता है. या धमकियाँ देने और उट पंटाग केसो मे उलझाने जैसी निचली और टुच्ची बातों पर उतर आता है. अरूण जी ने मुझे बताया था उन्होने ब्लोग डीलीट आपकी आत्म संतुष्टि के लिये किया था ताकि आप तन और मन से स्वस्थ बने रहे. अगर आप हम सब के ब्लोग जगत से हट जाने पर ही स्वस्थ हो सकते हो तो आप स्वस्थ रहे हम भी अपना ब्लोग हटा लेगे. हम लोगो का क्या है हमतो ब्लोगजगत में बिना राय दिये बिना लोगो को धमकी दिये भी स्वस्थ ही रहते है. दर असल अरूण जी पता नही था कि वकील लोग बिना राय दिये बिना कोर्ट कचहरी की धमकी दिये स्वस्थ नही रह सकते :) ये उन्हे और हमे भी आपसे ही पता चला इसके लिये धन्यवाद. अरूण जी को पहले से पता नही था वरना हम आपके खंबा नोचने से पहले ही ये काम कर देते. वैसे मै अरूण जी को जितना जानता हूँ वो दिखने में जरूर शकल से नही दिखते पर है, दयालु और बेवकूफ़ किस्म के आदमी. अरूण जी तो बिना किसी से मिले उसके काम आ सकते हो तो आ जाते है लेकिन आपसे तो वो मिल भी चुके थे. अगर आप अरूण जी बता देते कि आप ब्लोगजगत से हट जाओ तो वो वैसे भी हट ही जाते. हम आपकी दुविधा अब समझते है उधर सुरेश जी कसाब और काजिम के विरुद्ध लोगो का गुस्सा भडका रहे थे इधर अरूण जी. आपने कसाब और काजिम के हितों के लिये ब्लोगजगत मे कपिल जी काशिफ़ जी के साथ मिल कर मुहिम चलाई हुई है और अरूण जी वेदो मे क्या है , ना आप और काशिफ़ जी से समझना चाहते थे ,ना ही कपिल जी के कश्मीर से सेना हटाने की मुहिम मे शामिल हो सकते थे. अरूण जी मान रहे थे कि आप उनके ब्लोग पर तथा बिना किसी कारण के भी उन्हे दस हजार सम्मन भिजवा सकते थे लेकिन ब्लोग डीलीट उन्होने आपकी आत्म संतुष्टी के लिये किया था . सुरेश जी के पीछे आप जमाने से पडे है. कभी धनात्मक तो कभी कोई और राय. अब अरूण जी के पीछे पड गये थे .यानी या तो आपकी राय मानो या फ़िर कोर्ट मे आने की धमकी झेलो . मुझे नही लगता अरूण जी ने तो कुछ ऐसा नही कहा था वकीलो के बारे मे जो आप और आपके चेले उन्हे धमकात्मक राय देने पीछे पड गये श्रीमान .वैसे आप कितने महान है ? आपकी महानता की महिमा हमे जगह जगह दिखाई दे रही है. आप उन्हे गड्ढे मे से निकालने वाले भी बन रहे है पर उससे पहले उन्हे इस ( कोर्ट के चक्कर मे ) गड्ढे मे डालने की कोशिशो मे भी आप ही संलग्न दिख रहे है.

अपकी जानकारी के लिये ब्लोग पर वकीलो की ऐसी तैसी करती ये पोस्ट मै यहाँ फ़िर से पोस्ट कर रहा हूँ श्रीमान .इस की कुछ नाक कान टांग उखाड कर दिखायेगा और नही कर पाये तो झोला उठाकर चलते बनियेगा . बंदानवाज या सिर्फ़ आपकी धमकिया जो आपकी इज्जत कर रहे हो उन्ही के लिये है क्या? .यहाँ वकीलो की इतनी धज्जिया उखेडी गई है जितनी अरूण जी ने कभी की ही नही . सो अब किसीको मिर्ची लगे तो हम कुछ नही कर सकते :) वैसे आप यहाँ भी देख सकते है एक और पाकिस्तानी को वकील नही मिला है आप चाहे तो किसी को भेज सकते हैं, कसाब को नही तो दूसरे एक पाकिस्तानी आतंकवादी को बचाने की हसरत तो पूरी हो ही जायेगी.
यहाँ मथुरा के वकीलो ने देश प्रेम दिखा दिया है आपके वाला नही सच्चा देश प्रेम.

वैसे वकील कैसे होते है आप यहाँ भी ज्ञान अर्जन कर सकते है

वकील: नोटवर्किंग की कील

खास फीचर | द्वारा/by : अविनाश वाचस्‍पति | सोमवार , 23 जून 2008

काली करतूतों को सफेद कारनामा बनाने के लिए काले कोट वाले ही काम आते हैं। जिन्‍हें आप, हम और सब वकील के नाम से जानते हैं और वकील न ठोंके कील, हो नहीं सकता। काले कोट वालों की कीलियां करतूतें आज जगजाहिर हैं। इनकी कीलों की महिमा अपरंपार है। इन्‍हें देख सह कर भी अनदेखा अमहसूसा करने से ही समस्‍याओं से छुटकारा मिलता है। इन्‍हें रामबाण तो नहीं, हां वकीलबाण कहने में कोई बुराई नहीं है।

कीलें वही आहृलादकारी जो वकील चुभोते हैं। वकील की कील नेस्‍तनाबूद कर डालती है परन्‍तु अपने होने का रंच मात्र भी अहसास होने नहीं देती है। कोर्ट के दरवाजे के बाहर पेड़ों के नीचे इनके झुरमुट बगुला भगत की तरह ध्‍यान लगाए रहते है कि कोई उधर टपके तो उसको लपकें । शादी करानी हो या तलाक, मर्डर करके आए हो या करने जा रहे हों, पड़ोसी को हैरान करना हो या किसी खानदानी विवाद को निर्विवाद करना हो अथवा दूसरे के फंटे में टांग अड़ानी घुसानी हो , जरिया जनहित याचिकाएं.... वकील अपनी सेवाएं लिए हमेशा मुस्‍तैद मिलते हैं।

वैसे ऐसा भी नहीं है कि वकील सिर्फ कील ही चुभोते हैं। ये फांसें भी निकालते हैं । फांसें का मतलब फंसे हुए भी हो सकता है और बांस की जो महीन सी बांसीय तार का छोटा सा पीस शरीर के किसी भी अंग में कहीं भी समा जाती है और शरीर को भरपूर टीस देता है, उससे भी छुटकारा दिलाते है। फांसे का अर्थ फंसे हुए में लेने पर बोध होता है कि इनकी विरल माया फांसी के फंदे तक से छुड़ा लाने के लिए भी ख्‍यात होती है और इसी के चलते इन पर नोटों की जो बरसात होती है, उसके लिए सावन की जरूरत भी नहीं है, वो बरसात भूमि पर और इसके गर्भ में मौजूद यथा सागरीय जल के माफिक होती है जो कभी चुकती नहीं है और सदैव बरसती रहती है। इसमें आई सुनामी इनकी लॉ की लोकधुन को ला धन की गरिमा प्रदान करती है। नोटवर्किंग के बेशुमार द्वार ओपन करती है। लोग घर बार , गहने , भूमि सब कुछ बेचकर भी इनके काले कोट की जेबें अपने सफेद काले नोटों से भरते रहते हैं। फिर भी इनके बैंक खातों पर कोई रंग
नहीं चढ़ता और वे झकाझक सफेद ही रहते हैं। जब तक नोट देने वाले के पास होते हैं , धवल होते हैं परन्‍तु वकीलों के काले कोट की जेब में जाते ही स्‍याह हो जाते हैं। पर नजर सफेद ही आते हैं। आपने शायद ही सुना हो कि वकील को दी गई फीस की रसीद मिली हो या उस पर किसी तरह के टैक्‍स से राहत।

मुजरिम ही नहीं, निर्दोष भी इनके चंगुल में गुल हो जाते हैं क्‍योंकि अपनी निर्दोषता को साबित करने के लिए भी ये ही एकमात्र अवलंब होते हैं, इनके जाल में जो भी उलझा, उसे बाकी उलझनों से मुक्ति मिल जाती है। जब तक सांस है तब तक आस वाली उक्ति यहीं पर सटीक बैठती है। अपने जीवन भर की पूंजी दांव पर लगाकर मुजरिम अपने बचने के उपक्रम वकीलों के सहयोग से अनवरत करता रहता है। तो उधर सभ्‍य जन जो पुलिसिया उपक्रम इत्‍यादि के तहत फांसे गए होते हैं, अपने बचाव के लिए इन्‍हीं की शरण में जाते हैं, वे खुद तो बच जाते हैं पर सब कुछ लुटा बैठते हैं और फिर यही सब्र कर लेते हैं कि चलो जान बची तो लाखों पाए जबकि यहां पर लाखों के निवेश पर जान का डिवीडेंड मिलता है।

आप एक बार इनसे मिल भर लें, आपने सिर्फ मिलना है भरवा तो ये आपसे लेंगे ही, कभी कागज के नाम पर, कभी स्‍टांप के नाम पर, कभी फोटोस्‍टेट , कभी टाइपिंग और कभी किसी और कभी किसी, आप इनकी नोटवर्किंग में एक बार फंस कर तो देखिए, आपको नेटवर्किंग की तुच्‍छता का अहसास अपने आप हो जाएगा और इतने विरल अनुभव होंगे कि मैं तो एक लेख लिख रहा हूं आप एक पूरी पुस्‍तक नॉनस्‍टाप लिख जाएंगे, मानो भारत की राजधानी के दक्षिण में चालू हुई बहुचर्चित बीआरटी कॉरीडोर में बस की तरह बेलगाम बढ़ते चले जा रहे हैं।

इनके धन जुगाड़ने के नायाब तरीके हैरतअंगेज होते हैं। इस पर भी तुर्रा ये कि नोटों की गर्मी का इन्‍हें अहसास तक नहीं होता। कितने ही नोट बटोर लें पर इनके चैम्‍बरों में हीटर चलते मिलेंगे। नोटों की गर्मी इनके दिमाग में भी नहीं चढ़ती है। चाहे कितनी ही गर्मियां हों इनके झूठ बोलते समय आप पसीने की एक बूंद तक नहीं तलाश पाएंगे। झूठमर्मज्ञता में महारत हासिल ये कूल बने रहते हैं। मानो वकीलों की यह मदमस्‍त कौम सृष्टिरचयिता द्वारा सदैव ठंडी रहने के लिए ही अस्तित्‍व में लाई गई हो जबकि इनका संग इनके मुवक्किलों की जेबें बड़ी ही चतुराई से ठंडी करता रहता है। फिर चाहे कड़ाके की सर्दी ही क्‍यों न पड़ रही हो , मुवक्किल को इस सर्दी में भी आनंददायक गरमाहट की असीम अनुभूति होती है।

समझदार लोग तो वकील से संपर्क करने के बाद ही जुर्म को अंजाम देते हैं और मुजरिम की सम्‍मानोपाधि से भी वंचित बने रहते हैं । इनकी संगत की रंगत में आपके ज्ञानचक्षु भव्‍य दिव्‍यता पायेंगे कि इस मार्ग से होकर आप अपनी करतूतों को अमली जामा पहनाएंगे तो कानून आपको छू भर भी नहीं पाएगा और आप साफ बेदाग बच जाएंगे। पर उन दागों से बचने के लिए दाम भरपूर वसूले जाते हैं। इनके आगे तो पुलिस की मिलीभगतीय करतूतें भी बौनी साबित हो रही हैं। जबकि मुजरिमों को बचाने के लिए पुलिस कौम गजब की कुख्‍याति दिन सोलह गुनी रात चौंसठ गुनी अर्जित कर रही है। उनसे मिलजुलकर जुर्म किए जाते हैं ।

आपने खूब सुना होगा कि इस सांठ गांठ की गांठ बहुत कमजोर होती है, पुलिस की कलई भी खुल जाती है और पुलिस भी फंस जाती है। कभी आपने सुना है कि कभी कोई वकील अपने मु‍वक्किल को बचाते हुए खुद फंसा हो, जिस पर जग हंसा हो। मुजरिम बचे ना बचे, इन्‍हें कोई फंसा नहीं सकता। कानून की किताबों के कीड़े ऐसे ऐसे पेंच निकाल लाते हैं कि मुजरिम तो मुजरिम जज भी इनके मुरीद हो जाते हैं। उनको अपना मुरीद बनाने के लिए कुछ दाम भी लग जाएं तो क्‍या दुख, आखिर दाम में ही है दम। वकीलों द्वारा जजों को अपने मोहपाश में जकड़ने के किस्‍सों का खुलासा समय समय पर होता रहता है। आज के वकीलों में ही भविष्‍य का जज मौजूद होता है।

आपने कभी नहीं सुना होगा कि वकील रिश्‍वत लेते धरा गया जबकि जज धर लिए जाते हैं। इसका सीधा सा कारण है कि इनको चढ़ाए गए चढ़ावे को रिश्‍वत और घूस कतई नहीं कहा जा सकता। वकीलों को मिलते ही यह फीस हो जाती है और फीस लेना तो जायज होता है। वो बात दीगर है कि अब घूस देने को कानून सम्‍मत बनाने के लिए इस देश में प्रयास किए जा रहे हैं। अगर इन भगीरथी प्रयासों से वकीलों को जोड़ लिया गया होता तो अब तक तो सफलता मिले भी अरसा हो गया होता। ये चाहते तो उस पर टैक्‍स भरवा कर उसे कानूनी जामा भी पहनवा देते और एक बार कानूनी बन जाने पर उस टैक्‍स से बचने का तोड़ भी यही बतलाते। गजब के तिकड़मी होते हैं वकील। आप चाहे जीतें, चाहे हारें, चाहे सुलह करें पर इनकी विजय पताका वकीलों की ही फहराती है। यह जीतकर भी कभी फूलों के हार नहीं पहनते और फूल बनाते हैं। यह कहना भी समीचीन होगा कि इसलिए इन पर नोटों के फूल सदा बरस बरस का अपनी सुगंध बिखेरते रहते हैं

विश्‍व विजयी वकील हमारा।
नोटवर्किंग का दिखाये अदृभुत नजारा।

Read more...

Thursday, June 11, 2009

हिन्दी समर्थित मोबाइल

ये रहे वे मोवाइल फोन जो हिन्दी लिपि का समर्थन करते है. यह सूची यहाँ से प्राप्त की है, तथा बताने के लिए आलोक का आभार।

  • LG B2050
  • LG KG110
  • LG KG195
  • LG KG200
  • LG KG271/KG276/MG161B
  • LG KG300
  • Nokia 2610
  • Nokia 2626
  • Nokia 2630
  • Nokia 2650
  • Nokia 2760
  • Nokia 3110 Classic
  • Nokia 3500 Classic
  • Nokia 5070
  • Nokia 5200
  • Nokia 5300
  • Nokia 6021
  • Nokia 6030
  • Nokia 6070
  • Nokia 6080
  • Nokia 6101
  • Nokia 6230
  • Nokia 6230i
  • Nokia 6233
  • Nokia 6270
  • Nokia 6280
  • Nokia 6300
  • Nokia 7260
  • Nokia N95
  • Sony Ericsson J230c/J230i
  • Sony Ericsson J300i
  • Sony Ericsson K508i
  • Sony Ericsson K510c/K510i
  • Sony Ericsson K550c/K550i
  • Sony Ericsson K790c/K790i
  • Sony Ericsson T290c/T290i
  • Sony Ericsson W200c/W200i
  • Sony Ericsson W580c/W580i
  • Sony Ericsson Z530c/Z530i

Read more...

Tuesday, June 9, 2009

वकील ले लिए न्याय क्या है?

पंगेबाज ने माफी माँग ली, मगर एक आम भारतीय को ये सवाल अभी भी खाये जा रहें हैं। पंगेबाज के चिट्ठे पर आई टिप्पणियाँ यही साबित करती थी। मगर उन्होने अपना लेख हटा कर बहुत सारे लोगो का दिल दुखाया है। मैं यहाँ इस लेख को फिर से पोस्ट कर रहा हूँ। यह एक भारतीय का दूख है। मैं जानता हूँ कोई केस करेगा तो मेरे लिए किसी वकील को 2500 दैनिक की फीस देने वाला कोई नहीं होगा, कोई मानवाधिकारवादी नहीं रोएगा, कोई मोटी बिन्दी हाय हाय नहीं करेगी. मैं भारतीयों का खून बहाने वाला नहीं हूँ ना.

यह था पंगेबाज का लेख:
कालेज हम कभी गये नही , स्कूल जाने के दिनो मे अकसर स्कूल के पीछे पराठे खाते जरूर पकडे जाते थे. सो हमे आप कतई गवार, अनपढ, जाहिल, खरदिमाग बेअकलो की श्रेणी मे रख सकते है. लेकिन जनाब हमारी इस तुच्छ मोटी बुद्धी मे पिछले दिनो ब्लोग पढ कर कुछ सवाल गूंज रहे है .जिनका जवाब तलाशने मे पिछले दिनो हम बिलकुल नाकाम रहे.

सो आप बुद्धीमान लोगो के सामने मै ये अपने सवाल रख रहा हू . कृपया मेरी शंका का निवारण करे.

पिछले दिनो कुछ ब्लोगर्स ने मुंबई ताज घूमने आये महान पाक नागरिक (भारतीय नागरिको के अनुसार मुंबई हमलों के मुख्य आरोपी) मासूम * मोहम्मद अजमल आमिर कसाब और उनके कुल जमा १६६ हत्याओ के छोटे से कुकर्मो के साथ उनके वकील की हर जायज नाजायज चालो को को न्यायोचित ठहराने मे लगे हुये थे. . महान दाऊद भाई के खासमखास वकील अब्बास काजमी, जिनका कहना था कि इस केस में जीत बेहद मुश्किल है, लेकिन मैं न्यायालय ** मे कसाब को बचाने की हर मुमकिन कोशिश करूंगा. काजमी जी ने माना था कि- कसाब के खिलाफ
काफी सबूत हैं। लेकिन वो उन्हे झुठलाने की पूरी इमानादारी से कोशिश करेगे . हम सब ये देख भी रहे है कि वो लगातार उसे इस बारे मे ज्ञान दे भी रहे है . जिसके चलते कसाब कभी अपनी उम्र कम बताने की कस्मे खा लेता है कभी उसे उर्दू के अलावा कुछ समझ नही आता कभी उसे अखबार चाहिये होता है. यानी वकील *** साहब अपने धंधे के प्रति पूरी इमानदारी दिखाते हुये उसे मुकदमे को लंबा खीचने की हर मुमकिन कोशिश करने मे लगे है . इस सारे न्याय के खेल मे वकील के हिसाब से न्याय उसके मुवक्किल के हित के अलावा कुछ नही होता . ऐसा हमारे एक ब्लोगर वकील साहब का भी कहना है.यानी उसके द्वारा मारे गये लोगो के प्रति उसके वकील की कोई जिम्मेदारी नही होती . यही है न्याय की परिभाषा हमारे ब्लोगर वकील मित्र के हिसाब से .

यानी किसी के भी मानवाधिकार की ऐसी तैसी करदो फ़िर एक अच्छा वकील पकडो जो आपके मानवाधिकार के लिये न्यायालय मे न्याय की मांग करेगा . जिनके खिलाफ़ आपके अपराध किया है उन्हे झूठा ठहरायेगा. और आपको दुबारा वही सब करने के लिये न्याय दिलवायेगा . मुझे तो हसी आ रही है आपका पता नही . साहब आपकी बात से तो हमे यही समझ मे आता है कि नन्दा केस मे आई यू खान और आर के आनन्द भी अपने मुवक्किल के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे .आखिर येन केन प्रकारेण उन्हे अपने मुवक्किल को निर्दोष साबित कराने की हर मुमकिन कोशिश मे लगे हुये थे , अपने काम के प्रति पूरी इमानदारी से लगे हुये थे . यानी उन के साथ जो कोर्ट ने किया वो सरासर गलत था ? या फ़िर आप यह कहना चाह रहे है कि वो अपने मुवक्किल के प्रति पूरी इमानदारी से कार्य तो सही कर रहे थे .लेकिन पकडॆ नही जाना चाहिये था . इससे हमे यही समझ मे आता है की अपराध करना कतई बुरा नही है . पकडे जाना बुरा है यही है जाने माने वकीलो की दूर्ष्टी मे न्याय . अब यही वकील साहब कुछ परिक्षाये पास कर न्यायाधीश बन जाते है सो न्याय के बारे मे न्यायालय के बाये मे आप सब अपनी राय बदल ही ले तो बढिया .

जैसे की देश के और लाखो केसो मे नही पकडे जाते . बाकी जो मरे उनके साथ हुये न्याय या अन्याय से बचाव पक्ष का कोई लेना देना नही होता. शायद आप वकील लोग की सोच यही बनाई जाती होगी पढाई के दिनो मे . आपको सच क्या है ? इससे कोई लेना देना नही . जिससे आपको पैसे मिले वो बलातकारी सही ,गुंडा सही ,डकैत सही, पर आपको उसे न्याय के नाम पर कोई भी दंद फ़ंद कर गवाहो को तोड उन्हे इस हद तक दुखी करे कि वो उस केस से या तो हट जाये या फ़िर आपके हिसाब से गवाही देदे , और आप उसे बाईज्जत निर्दोष साबित करदे . क्या वकालत पढते पढते लोगो की अंतराआत्मा साथ छॊड जाती है ?

तभी वकील साह्ब बलातकार की शिकार महिला को अपने बलातकारी मुवक्किल के फ़ेवर मे बदचलन साबित करने और भद्दे सवाल पूछने मे लग जाते है ? जरा सोचिये उस जगह किसी दिन आपके परिवार का कोई सदस्य हो , क्या तब भी आप उस बलातकारी गुंडे डकैत की तरफ़दारी करगे . जब आपका ही कोई सहयोगी आपके दर्द मे भागी दार बनने के बजाय आपके दर्द् की बखिया उधेड रहा होगा तब आपको कैसा लगेगा बंधु ? सोचियेगा ? अगर कही आपकी अंतरात्मा भी जिंदा बची हुई हो तो ? वरना लगे रहिये अपने धत कर्मो के बोझ से उसे दबाकर मारने मे
खैर छोडिये ये सब . मै आपको एक बात बताना भूल गया . अगर कोई गरीब बंदा बेचारा वक्त का मारा गरीब आदमी किसी गुनाह मे . कही झगडा कर बैठा .किसी को गुस्से मे हसिया उठाकर फ़ेक कर मार दिया . और न्यायालय मे अपने बचाव के लिये कोई वकील खडा नही कर पाया तो न्यायालय उसके पक्ष को प्रस्तुत करने के लिये एक वकील मुहैया कराता है जिसे पूरा मुकदमा लडने के लिये ९०० रुपये सरकार की और से दिये जाते है.

अब ये बात जज साहब भी जानते है कि ९०० रुपये मे नंगा नहायेगा क्या निचोडेगा क्या ? लेकिन एक गरीब गुर्गे भारतीय नागरिक की क्या औकात जो उसके बारे मे किसी को कुछ सोचने की फ़ुरसत हो ? क्या आपको पता है कि भारतीय जेलो मे बंद आधे से ज्यादा लोग ऐसे है जिन्हे मुकदमे के फ़ैसले मे ज्यादा से ज्यादा दो साल की सजा होती परंतु उन्हे सालो हो चुके है जेलो मे पडे हुये क्योकी ना तो उनसे मिले सरकारी ९०० रुपये वाले वकील को मतलब है नाही प्रशासन को .

लेकिन जनाबे आली मुंबई मे इत्ते भारतीयो को मारने वाले बंदे को न्याय मिलने की फ़िकर देश के बाकी महानुभावो को ,वकीलो को और न्यायाधिकारियो को इतनी है कि उसके लिये ढूंढ कर इसी प्रकार के अपराधियो का मुकदमा लडने **और उन्हे बचाने के महान कृत्य मे संलग्न बंदे तो तलाश ही लाये .

मजे की बात यह है कि इससे पहले जो भी वकील इस केस को लडने के लिय़े खडे हुये उनके घर जाकर तोड फ़ोड की गई पर इनके आते ही तोड फ़ोड वाले अपने अपने घर जाकर सो गये . शायद वो इसी लिये बाकियो को धमका रहे होंगे कि केवल ये जनाब ही इस केस मे मुकदमा लड सकने के लिये दाऊद भाई ने तलाश रखे होंगे. जो कसाब या उसके वकील के साथ खडा नही हो सका वो उसे बाहर से समर्थन दिलाने मे लग गया. या मुझे पता नही होगा चोर चोर मौसेरे भाई की तरह धत करमो मे वकील वकील मौसेरे भाई ही होते होंगे.

अब जनाब काजिम साहब साहब के केस संभालते ही अचानक जो अज़मल कसाब पहले तोते की तरह सारी बातें उगल-उगलकर बता रहा था, धूर्त वकील की संगत में आते ही घाघ लोमड़ी की तरह बर्ताव करने लगा है। सबसे पहले तो वह अपनी कही पुरानी सारी बातों से ही मुकर गया, फ़िर उसके काबिल वकील ने उसे यह भी पढ़ाया कि “वह अदालत से माँग करे कि वह नाबालिग है, इसलिये उस पर इस कोर्ट में मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिये”, फ़िर अज़मल कसाब ने एक और पाकिस्तानी वकील की भी माँग की, अब उसके माननीय वकील ने माँग की है कि पूरे 11000 हजार पेजों की चार्जशीट का उर्दू अनुवाद उसे दिया जाये ताकि वह अपने मुवक्किल को ठीक से केस के बारे में समझा सके और कसाब समझ सके. कभी वो अपने पैसे मांगने लगता है. कभी उसे अपनी बोरियत दूर करने के लिये अखबार चाहिये होता है कभी उसे बैरक से बाहर निकल कर घूमने और वर्जिश करने की जरूरत महसूस होने लगती है. उसे इतने लोगो के मारने पर जो शर्मिंदगी महसूस होने लगी थी अचानक ना जाने कही गायब हो गई. और हमारे ब्लोगर वकील दोस्त कहते है कि इस तरह उसे न्याय दिलाया जा रहा है.

इन्ही सारे मसलो को समझने की कोशिश करते हुये हम तालीबानी घोषित हो गये थे. लेकिन उनहोने अचानक अब कसाब के साथ काजिम खान की भी परवी शुरू करदी तो हमे फ़िर से कूछ सवाल सूझ गये. भाई माना हम पढे लिखे नही है पर ये कहा लिखा है कि अनपढ न्यायालय और वकीलो के बारे मे नही जानता.

१. एक साधारण वकील दिन मे ८ से १० कोर्ट केस अटैंड करता है तो क्या काजमी साहब जैसा जिसके जिम्मे नदीम ( गुलशन कुमार ह्त्याकांड) १९९३ की मुंबई बम कांड, इंडियन मुजाहिद्दीन ,माननीय दाऊद कास्कर के दाये हाथ एजाज पठान जैसे अनेक मासूम और मजलूम लोगो के लिये भी वकालत करते है केवल इसी एक केस मे हाथ डाले रहेगा ? (इस समय काजमी के पास तीस केस हैं)

२. क्या काजमी साहब को ये कार्य ( कासिब को बचाने का) इतना धार्मिक कृत्य लगा कि वो बाकी सारे केसो से हाथ खीच बैठे और उन सारे पुराने मुवक्किलो को बीच मे ही अल्लाह भरोसे छॊड बैठे ? तो भाई आप मे से कोई सज्जन मुझे बतायेंगे कि अगर इस अपराधी को फ़ासी के फ़ंदे से बचाना वकील साहब को इतने सबाब का काम लगा कि उन्होने पैसे वाले केस जिनसे वकील साहब को दिन मे पचास हजार या लाख रूपये की कमाई हो रही थी छॊडना उचित लगा तो फ़िर मुझे कासिब और उनके वकील साहब मे काले कोट के अलावा कोई अंतर नही दिखाई दे रहा . एक सबाब कमाने के लिये १६६ भारतीय नागरिको को मार देता है दूसरा सबाब कमाने के लिये उसे बचाने मे लग जाता है .या फ़िर अकेले इस केस से वकील साहब को बाकी सारे केसो के बराबर कमाई हो रही होगी . पैसा उसी चैनल से आ रहा होगा जिससे एजाज पठान और बाकियो के केस मे आ रहा था.

३. हर बडे वकील के पास कुछ प्रशिक्षु वकील होते है जो बिना किसी या फ़िर बहुत थोडे धन के लिये उसके साथ काम करते है . सो ये बाकी केसो मे तारीख लेना और अन्य कार्य निपटाते है. अदालत मे शायद आपको पता नही जजसाहब के साथ बैठे पेशकार से लेकर लिपिक तक डायरी चढाने वाले से लेकर साथ के कमरे मे बैठे नोटिस टाईप करने और तामील कराने वाले को हर तारीख पर पैसे दिये जाते है . ये एक सामान्य पर्क्रिया है न्याय पालिका की .इस सब कार्य के लिये मुवक्किल से लिये गये हर तारीख पर पैसे से ही इन सब ( प्रक्षिशु वकील और अन्य खर्चे ) का खर्चा
निकल आता है. और इस केस मे ये खर्चे भी नही मिलने वाले . तो ये इत्ता घाटे का सौदा कैसे कर गये काजिम साहब . ये भी हमे बता ही दीजीये जनाब . जब आप उनहे मिलने वाले २५०० रुपये रोज की सफ़ाई मे आ खडे हुये है . यानी मामला सबाब या फ़िर कही और से मिलने वाले पैसे का ही है ना ?

३. अब अगर हमारे माननीय वकील साहब टाइपिस्ट, क्लर्क, चालक आदि के वेतन, वाहन का खर्च, ऑफिस का खर्च, पुस्तकों, कम्प्यूटर, इंटरनेट व स्टेशनरी आदि का खर्च सारे खर्चे एक ही बेचारे एक ही कासिब पर डालना चाहते है तो अलग बात है . वैसे जनाब वकील साहब चाहे तो इसमे उनकी ला की पढाई का खर्चा भी जोड सकते है . लेकिन एक सवाल मेरा भी है कि बाकी सारे प्रोफ़ेशनलस का खर्चा भी उनकी फ़ीस मे शामिल ही होता है उन्हे भी कार ड्राईवर कागज पेन कंप्यूटर स्टेशनरी फ़्री मे नही आती जनाबे आली, तो इन वकील साहब के लिये इत्ती पैरवी काहे जनाब ?

४ हमे भी वकील साहब की फ़ीस २५०० रुपये रोज कोई ज्यादा नही लग रही . और वो भी अपराधिक मामलो के इत्ते फ़ेमस वकील साहब की . इससे कई गुना फ़ीस तो वकील साहब अपनी १० मिनट की एक सिंटिंग मे दी गई राय की ले लेते होंगे . हमे तो शको शुबह वकील साहब सुबह ११ बजेसे शाम पांच बजे तक हफ़्ते मे पांच दिन इस केस को इत्ती कम फ़ीस पर इस केस को लेने पर है. यानी मामला या तो सबाब कमाना है या फ़िर धन का प्रवाह कही और से ही है जनाबे आली . बाकी भारत मे जुगाड एक बडी चीज है . और दाऊद भाई के पुराने भरोसे के वकील के लिये कोई मुश्किल काम नही है जी .

५. जब भारतीय नागरिक के लिये सरकार की तरफ़ से न्याय दिलाने वाले वकील का खर्च ९०० रुपये ही है तब यहा इतनी दयानतदारी किसलिये ? या न्याय पालिका के लिये भी भारत सरकार की तरह नागरिको की जान का मूल्य अलग अलग है . गरीब ५ रुपये की चोरी के अपराधी के लिये उसकी जान की कीमत ९०० रुपये और उम्र कैद तथा १६६ भारतीय नागरिको को मारने वाला आतंकवादी न्याय के नाम पर हो रहे ड्रामे की कीमत आपके सामने है.

६. उन का बड़प्पन है कि उन्हों ने इस फीस में यह काम करना स्वीकार किया है।इस के बावजूद यदि यह कहा जा रहा है कि उन पर सरकार खजाना लुटा रही है अब साहब बडप्पन तो उनका है ही कि वे भारतीय न्याय पालिका के नियम कानूनो मे छेद ढूढ कर देश के गद्दारो का साथ खडे है . छॊटी सी झलक ये देखिये उनके बड्प्पन की 1993 के मुम्बई बम धमाकों के एक अंडरवर्ल्ड आरोपी एजाज़ पठान को षडयन्त्र रचने और विस्फ़ोट में उसकी भूमिका हेतु दस साल कैद और सवा दो लाख रुपये जुर्माना की सजा मुकर्रर हुई। टाडा कोर्ट ने उसे जेल में ही रखने का आदेश दिया था। (इस खबर को यहाँ पढ़ें) एजाज़ पठान को दाऊद के भाई इब्राहिम कासकर के साथ 2003 में भारत लाया गया था।
अब्बास काज़मी साहब ने कोर्ट द्वारा सरकार से एजाज़ पठान को “दिल की बीमारी के इलाज” के नाम पर दो लाख रुपये स्वीकृत करवाये (यानी सवा दो लाख के जुर्माने में से दो लाख रुपये तो वापस मिल ही गये)। कठोर सजायाफ़्ता कैदियों को महाराष्ट्र की दूरस्थ जेलों में भेजा जाता है, लेकिन एजाज़ पठान, काज़मी साहब की मेहरबानी से मुम्बई में आर्थर रोड जेल अस्पताल में ही जमा रहा, जहाँ उसकी दिल का दौरा पड़ने से मौत हुई।

तो जनाब बडप्पन काहे का ? काहे का एहसान ? काहे आप अपने ब्लोग पर लिख लिख कर देश पर काजमी साहब का एहसान लादने मे लगे है जनाबे आली ? मामला हमारी समझ से परे है. हमतो अब अपने पर कसाब का और आपका भी एहसान मानने लगे है साहब .कि उसने भारत पर हमला किया और आपने उसको न्याय मिले दुनिया देखे कि उसे न्याय मिला है इस बात की पैरवी बाहर से ही सही पर करने मे लगे है. वैसे आपकी नजर मे बाकी जो मरे वो मक्खी मच्छर थे .उन्हे जीने का हक तक नही था ? उन्हे भी एहसान मानना चाहिये कासिब का और उनके वकील का तथा उसे बाहर से समर्थन दे रहे आप सब का कि उनका क्षण भंगुर जीवन इस काम तो आया कि उनके मरने का केस और उसमे भारत की न्याय प्रक्रिया और उसमे अपराधी के मानवाधिकारो की चिंता दुनिया ने देख ली . उन्हे भी पता चल गया कि भारत के लोगो को अपने नागरिक के लिये न्याय मिलने से ज्यादा जरूरी दुनिया को दिखाना है कि यहा न्याय के नाम पर एक सीधे सच्चे भारतीय नागरिक के अलावा किसी से अन्याय नही होता यानी यू भी कहा जा सकता है कि लायर ( इसे वकील के संदर्भ मे ले झूठे की नही)की लायलटी जस्टिस के प्रति नही बल्की उसके क्लाईट के प्रति है और इस्रे ही लायर्स की भाषा मे न्याय करते है , यानी हम सारे भारतीय नागरिक गलती पर थे जो समझते थे की न्यालय मे न्याय मिलता है . धन्यवाद जी आपका जो आपने हमे इस सच से रूबरू करा दिया .

वैसे भाई साहब आप भी अपना कुछ बड्प्पन आस्ट्रेलिया मे मर रहे भारतीयो को न्याय दिलाने मे काहे नही खर्च करते . या भारत वंशियो का कोई कही कोई अधिकार नही है ? पाक मे बंगलादेश मे अरे वहा छॊडिये यही कश्मीर मे हिंदुओ को काहे नही आप न्याय दिलाने का बडप्पन दिखाते . लेकिन उनके मौलिक अधिकार छीनने वाले को न्याय दिलाने वालो के साथ खडे हुये रहते है आप जनाब सेकुलरता की थाती थामे ? .

थू है ऐसी मानसिकता पर जिसे एक सामान्य भारतीय के अलावा बाकी सबके मानवाधिकार की चिंता रहे , और ऐसे टुच्चे बडप्पन पर . लेकिन क्या करे सेकुलर हो या वामपंथी सबकी लेखनी और वाणी और बुद्धी तीनो को एक सामान्य भारतीय नागरिक और गलती से वो हिंदू हो तो लकवा मार ही जाता है सेकुलरता और वाम पंथ चीज ही ऐसी है वैसे मुझे पता है कि आप दिल मे मुझे और उन भले मानुसो को जिन्होने जनाब काजिम साहब को जिम खाना क्लब से बाहर किया है, या जिन्होने आपके कसाब साहब के साथ भारत पधारे उनके संगी साथियो जिन्हे भारतीय सेना ने मार डाला( शायद आपके हिसाब से हत्या ) , जो उन्हे दफ़नाने के लिये भी जगह देने को तैयार नही है .ढेरो गालिया दे रहे होंगे . दीजीये लेकिन उसके साथ उनके मानवधिकार और जिंदा रहने के अधिकार की चिंता के साथ जॊ मासूम भारतीय इन हरामजादे कसाबो की गोलियो का शिकार हो काल कलवित हो गये है कभी उनके भी जीने के अधिकार के बारे मे सोचियेगा . शायद वो खुदा आपके भी कुछ गुनाह माफ़ करदे *( ध्यान दे भले ही आपने खुद उसे गोलिया चलाते देखा हो लेकिन न्यायालय मे अपराधी सिद्ध होने से पहले मासूम के अलावा कुछ नही कह सकते )
** ( जहा न्याय की देवी की आखो पर पट्टी बांध कर उसे हाथी की सूंड पकडा कर हाथी की पूछ गवाहो के जरिये बताई जाती हो)
**जहा आपका वकील आपको कितना सच बोलना है और किस बोले हुये सच को आप कानूनन मुकरने का अधिकार रखते हो. तथा आप अपने द्वारा किये गये अपराध के दंड से किस किस तकनीकी आधार पर न्यायाधिकारी
के सच जानते हुये भी बच सकते हो का ज्ञान कराता है.
***वकील . वो आदमी जो आपको आपके किये गये अथवा किये जाने वाले अपराध से न्यायाधिकारी को कानून के तकनीकी छेदो के दाव पेचो मे घुमाकर आपको निरा शरीफ़ साबित करदे . लेकिन दिल्ली के दो बडे
वकील आई यू खान और आर के आनन्द की तरह पकडा ना जाये जी .

Read more...

Friday, March 27, 2009

कथित धर्मनिरपेक्षता की विडंबनाएं

वरुण गांधी के प्रति भारतीय सेकुलर सत्ता का जो व्यवहार रहा है, वह उसके अंतर्मन के हिंदू द्वेषी चरित्र को ही उद्घाटित करता है. जो निर्वाचन आयोग शहाबुद्दीन, लालू प्रसाद और आजम खां जैसे विभिन्न अपराधों के आरोपी तथा हिंदुओं के विरूद्ध विषवमन करने वाले लोगों के बारे में कभी सक्रिय नहीं हुआ और जिसने यह भी नहीं देखा कि कोयंबटूर बम धमाकों का मुख्य आरोपी मदनी न सिर्फ़ जेल से चुनाव लड़ा, बल्कि आज वह केरल की माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की चुनावी राजनीति का संचालनकत्त्रा दिख रहा है. फ़ारूख अब्दुल्ला ने सार्वजनिक बयान दिया कि अगर अफ़जल को फ़ांसी दी गयी, तो मुल्क में आग लग जायेगी. अब्दुल रहमान अंतुले ने तो कसाब के मामले पर भारतीय शहीदों का अपमान किया, पाकिस्तान की भाषा बोली. फ़िर भी राहुल और प्रियंका की कांग्रेस ने न उस समय गीता पढ़ी न बाइबल और न ही अपने राज धर्म का किसी भारतीय विद्वान से ज्ञान प्राप्त किया. नतीजा यह निकला कि अंतुले से मंत्री पद वापस नहीं लिया गया.

केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह ने बाटला हाउस प्रकरण में शहीद मोहनचंद शर्मा का अपमान कर आतंकवादियों के अदालती खर्च के लिए पैसा देने वाले उपकुलपति को समर्थन दिया और उन्हें देश के 16 अन्य उपकुलपति चुनने वाली समिति का संयोजक बना दिया. ऐसे सेकुलरों और उसी रंग वाले चुनाव आयोग ने वरुण गांधी के बारे में भाजपा को यह सलाह देने की जरूरत समझी की पार्टी वरुण गांधी को टिकट न दें. ओखर वरुण गांधी का अपराध क्या था? उन्होंने हिंदुओं की दीन-हीन दशा देखकर उनमें साहस भरने तथा उन्हें यह अहसास दिलाने का प्रयाास किया कि वे अकेले नहीं हैं और गांधी परिवार का एक वंशज हिंदुत्व पर स्वाभिमान हृदय में धारण किये उनके साथ खड़ा है. वरुण को न मूल सीडी सुनायी गयी न सफ़ाई का मौका दिया गया. बल्कि सेकुलर मीडिया और 10 जनपथ के दबाव में फ़ैसला कर दिया गया.

वरुण गांधी नेहरू खानदान में ऐसे पहले व्यक्ति हुए हैं, जिन्होंने हिंदू धर्म के प्रति अपने स्वाभिमान को सार्वजनिक रूप से प्रकट किया है. अभी तक भारतीय राजनीति में गांधी-नेहरू परिवार हिंदुत्व के समर्थकों पर कटुतम आघात करने के लिए जाना जाता रहा है.वरुण गांधी के समान ही गांधी-नेहरू वंश के उत्तराधिकारी है, राहुल गांधी. क्या कोई राहुल गांधी से यह अपेक्षा कर सकता है कि वह हिंदू धर्म, सभ्यता एवं संस्कृति के समर्थन में एक वाक्य भी कह सकें? मूल बात तो यह है कि उन्हें हिंदू धर्म और संस्कृति की जानकारी होगी, इसमें भी संदेह है. रामायण या महाभारत के बारे में उन्होंने कुछ अंगरेजी में ही पढ़ा होगा? क्या उन्हें जानकारी होगी कि हिंदुओं ने पिछली शताब्दियों में कितने संघषाब और अत्याचारों से गुजरते हुए अपने धर्म और जीवन शैली को बचाये रखने में सफ़लता पायी है और अब जब माना जाता है कि वे स्वतंत्र हैं, राहुल की पार्टी के नेतृत्व में उन्हीं हिंदुओं की आस्था और संवेदनाओं पर तीव्र आघात किये जा रहे हैं. यह है नेहरू और इंदिरा के दो प्रपौत्रों और पौत्रों में फ़र्क. एक भारत के साथ खड़ा है, दूसरा भारत को जानता नहीं है.

भारतीय राजनीति में आज हिंदुत्व का समर्थन जिस गति से बढ़ा है, उसे देखते हुए सेकुलर तत्वों का विरोध और धनीभूत होता गया है. आज सार्वजनिक जीवन में हिंदुत्व के प्रति दुराग्रह घटा है और मीडिया तथा अन्य क्षेत्रों में भी हिंदुत्व का समर्थन अब स्वीकार्य होने लगा है. इस स्थिति में यह आश्चर्य नहीं है कि आम जनता में वरुण गांधी का समर्थन तीव्रता से बढ़ा दिखता है.ओखरकार हिंदू केवल अपनी संवेदनाओं और प्रतीकों के प्रति तनिक सम्मान ही तो मांगते हैं. इस सरकार तथा सेकुलर तत्वों ने प्रचलित सेकुलरवाद का अर्थ सर्वपंथ समभाव के बजाय प्रकट हिंदू विद्वेष को बना दिया है, जिसकी हिंदू समाज में तीव्र प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नये सरसंघचालक मोहन राव भागवत ने भी स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए स्पष्ट कहा कि हिंदुत्व के प्रति वे तनिक भी समझौता नहीं करेंगे. हिंदुत्व समर्थकों के कारण भारत के शेष सभी मतावलंबियों को वैचारिक स्वतंत्रता का वातावरण प्राप्त हुआ है, परंतु यह बना रहे इसके लिए जरूरी है कि इस वैचारिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने वाले हिंदू समाज की भी सुरक्षा हो और उसके सम्मान को ठेस न पहुंचे. इस परिस्थिति में आने वाले चुनावों तथा राजनीति का विॐेषण ज री है. इस परिस्थिति को बदलने के लिए सभी राजनीतिक दलों में सक्रिय नेताओं को सोचना होगा कि उनकी राजनीति का उद्देश्य क्या है? सिर्फ़ पैसा कमाना, ऐश करना और मर जाना या कुछ देश के लिए ऐसा भी करके जाना ताकि आने वाली पीढ़ियां उनको सिर्फ़ उनकी दौलत या मंत्री पद के लिए नहीं, बल्कि इसलिए याद करें कि उन्होंने देश और धर्म की मूल पहचान की रक्षा के लिए तन-मन-धन अर्पित कर दिया था.

पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान से छह हजार हिंदू जान और इज्जत बचाकर भारत आये हैं. इन परिवारों की आप बीती रोंगटे खड़ी करती है. यह बात यहां का कोई राजनीतिक दल समझ सकेगा? पाकिस्तानी हिंदुओें की जो पीढ़ी भारत आयी है, वह भारत से उतने ही अजनबी है, जितनी वह बांग्लादेश या इंग्लैंड से होगी. वे भारत इसलिए आते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यहां उन्हें सुरक्षा मिलेगी. इस पृथ्वी पर कहीं भी कभी भी यदि हिंदुओं को कोई कष्ट होता है, तो वे भारत माता की गोद आ दुबकते हैं. चाहे उनका पासपोर्ट किसी भी देश का क्यों न हों. पर उन चैनलों और मीडिया के अन्य साधनों के लिए पाकिस्तानी हिंदुओं की व्यथा- कथा और रूदन महत्वहीन ही रही, जिन्होंने मेंगलुरू में एक पब की घटना को दुनिया भर में हिंदुओं का चेहरा विकृत दिखाने के लिए तूफ़ान की तरह फ़ैला दिया था.

पिछले दिनों पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ़ भारत आये थे. एक साहसी पत्रकार प्रेरणा कौल ने मुशर्रफ़ से पूछा- मैं कश्मीरी पंडित हूं, मेरा घर श्रीनगर में है. लेकिन मैं अपने घर नहीं जा सकती, होटल में रूकना पड़ता है. आप बता सकेंगे कि क्या हम वहां लौट सकेंगे? मुशर्रफ़ एक क्षण को सन्नाटे में आ गये. प्रेरणा कौल के सवाल का जवाब भारत को भी देना होगा. वे लोग जो चुनाव लड़ रहे हैं, वे जब भारत में ही हिंदुओं की रक्षा नहीं कर पाते और बेघर कर दिये गये हिंदुओं को अपने ही देश में अपने घर नहीं लौटा पा रहे हैं, तो उनसे पाकिस्तान या बांग्लादेश में हिंदुओं को बचाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

 

(लेखक : तरुण विजय

 

साभार : प्रभात खबर

 

कड़ी : http://www.prabhatkhabar.com/news/4113.aspx )

Read more...

Friday, December 19, 2008

अंतुले को मैडम का अभयदान

शुक्रवार देर शाम प्रधानमंत्री निवास पर मंत्रिमण्डल की बैठक हुई जिसमें कॉंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने प्रधानमंत्री, विदेशमंत्री, रक्षामंत्री व अपने सलाहकार अहमद पटेल के साथ मंत्रणा की और मुस्लिम संगठनों के बीच अंतुले के बयान को मिल रहे समर्थन को देखते हुए फिलहाल उसकी बर्खास्तगी को टाल दिया है। अब सोमवार-मंगलवार तक प्रणब मूखर्जी का बयान आने की आशा है। अगर दबाव में अंतुले से इस्तिफा लेना भी पड़ा तो उसे महत्त्वपूर्ण जगह दी जाएगी।

देशवासियों की भावनाओं पर अल्पसंख्यकों का समर्थन भारी पड़ा। शाबास सोनिया। नेहरू का अधूरा छोड़ा काम दुसरा विभाजन आप ही करोगी।

Read more...

Wednesday, December 17, 2008

सावधान कसाब के पक्ष में देशद्रोही सक्रिय होने लगे है

यह तो होना ही था। मगर इतनी जल्दी भारतीयों का खून ठण्डा पड़ जाएगा, इसकी उम्मीद नहीं थी।

हरामखोर, देशद्रोही और खूद को धर्मनिरपेक्ष कहलवाने वाले लोग मुम्बई के हत्यारों के पक्ष में बोलना शुरू कर दिया है। अब भी अगर नहीं जगे तो यूँ ही तील-तील कर मरना होगा। इन हरामखोर पाकिस्तान परस्त लोगो को बीच चौराहे पर जूतों से मारो।

यहाँ समाचार देखें। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री ए. आर. अंतुले ने महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ता (एटीएस) प्रमुख हेमंत करकरे की मौत पर सवाल खडे किए हैं। हमारजादे से कोई पूछे जब आंतकी लोगो को मार रहे थे तब कोई कैसे बीच में ही केवल करकरे को मार गया। या हर मरे हिन्दु मुस्लिम की लाशों को अलग अलग कर बता किसको तुम्हारे देवदुत पाकिस्तानियों ने मारा और किसे दुष्ट हिन्दुओं ने।

अभी तो एन.डी.टी.वी. के विनोद दुआ और अरूंधती, महेश भट्ट जैसे लोगो का भोंपू बजना बाकी है।

आओ भारतीयों के प्राणों को हरने वालों का पक्ष लेने वाले देशद्रोहियों का भोंपू बजा दें।

Read more...

Tuesday, December 16, 2008

इस्लामियों द्वारा हिन्दुओं को मारा जा रहा है

पहले वे भारत में घूस पर भारतीयों को मारा और अब पाकिस्तान में हिन्दुओं को मार रहे है। मूम्बई धमाकों के बाद पाकिस्तान में हिंदू परिवारों का रहना मुश्किल हो गया है। बहू-बेटियों से दुष्कर्म किया जा रहा है। ऐसे में कहाँ है अरूंधती और कहाँ है सेक्युलर मीडिया।

जब भी आंतकी हमला होता है, नपुंसक नेता “भाईचारा” बनाए रखने का राग अलापते है। अरे हम तो सभ्य लोग है, भाईचारा बना रहेगा, मगर उन बर्बर मजहबी प्रजाति का क्या जिसे अपने अलावा और किसी का अस्तित्व मंजूर नहीं।

दुनिया के किसी भी कोने में मुस्लिमों पर अत्याचार होने पर हमारे नेता आँसू बहाने लगते है, उनके आँसू हिन्दुओं की मौत पर क्यों नहीं आते?

हिंदू परिवारों का कहना है कि पाक में वही हाल दोहराया जा रहा है जो बंटवारे के दौरान हुआ था। और हम अफ्जल को गले लगा रहें है। धिक्कार है..धिक्कार है...धिक्कार है।

Read more...

Wednesday, November 26, 2008

अब हूसैन पर फिल्म नहीं दिखाई जाएगी

सुचना व प्रसारण मंत्रालय के फिल्म डिविजन के उच्चाधिकारी के मुम्बई में कहा है कि अब हिन्दु देवाताओं के दूषित चित्र बनाने वाले चित्रकार हूसैन पर बनी डॉक्यूमेंटरी फिल्म 39वें भारतीय अंतराष्ट्रीय फिल्म उत्सव में नहीं दिखाई जाएगी। ज्ञात रहे कुछ हिन्दू संगठन इसका विरोध कर रहे थे।

Read more...

Friday, November 21, 2008

माइकल जैक्सन ने इस्लाम कबूला. अब गाना छोड़ेंगे?

खबर है कि माइकल जैक्सन ने इस्लाम कबूल कर लिया है और अपना नाम  बदलकर मिकाइल कर लिया है। 50 वर्षीय जैक्सन ने लास एंजेलिस में अपने मित्र के घर पर कुरान के प्रति आस्था व्यक्त की। जैक्सन को एक इमाम ने यह रस्म अदा करवाई।

यानी माइकल अब नाच गाने से तौबा कर लेंगे? क्योंकि इस्लाम में नाचना, गाना, गहने पहनना और प्लास्टीक सर्जरी करवाना तो हराम है।

या इसके पीछे भी कोई राज है?  माइकल जैक्सन के खिलाफ बहरीन के प्रिंस अब्दुल्ला अल खलीफ ने रिकार्डिग कांट्रेक्ट तोड़ने के मामले में 47 लाख पाउंड का मुकदमा ठोक रखा है। तो यह पैसे बचाने के लिए तो नहीं?

Read more...

Thursday, November 20, 2008

मीडिया की नजर में हिन्दु आतंकी नहीं

मन माँगी मुराद पूरी हुई और अपने चहेते इस्लामि आतंकवादियों के पाप को धोने का अच्छा मौका हाथ लगा तो मीडिया ने हिन्दु आतंकवाद पर खूब शोर मचाया।  समय के साथ मीडिया वालो को गलती का अहसास हुआ है, अब हिन्दु नहीं मात्र साधू संत ही आतंकी है। अब वे "भगवा आतंकी" शब्द का प्रयोग करेंगे। जय हो भोले नाथ।

Read more...

Tuesday, November 11, 2008

जरूर पढ़ें : हिन्दू आतंकवाद का अतिवाद

पेरिस स्थित "La Revue de l'Inde" के मुख्य संपादक फ्रैंको गोतिये का लेख हिन्दू आतंकवाद का अतिवाद हर समझदार व्यक्ति को जरूर पढ़ना चाहिए. देखें साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की गिरफ्तारी के बाद "हिन्दू आतंकवाद" के बारे में एक आजन्म कैथोलिक ईसाई क्या सोचता है?

Read more...

Monday, November 10, 2008

आमी चीन के भालो बासी

बंगाल की वामपंथी सरकार ने देशी कम्पनी को बाहर का रास्ता दिखा, चीनी कम्पनी को गले लगाया है? एक खबर के अनुसार बहुत सम्भव है कि अब चीन की कार सिंगूर से निकले। ज्ञात रहे, वामपंथियों के लिए चीन की कम्पनियाँ बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ नहीं मानी जाती और न वे पूँजीवादी होती है।

Read more...

  © Blogger template The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP