Saturday, November 17, 2007

बुद्धदेव बनाम नरेन्द्र भाई

ढ़ाई आखर वाले भाई ने कहा अंतर बताओ, फिर तुलना करने लगे. उन्होने समानता बताई, हम अंतर बताय देते है.

बूद्धदेव बेशर्मी से जो हुआ उसे जायज बताते है, नरेन्द्रभाई में इतनी शर्म है.

नरेन्द्र भाई के नैतृत्व में गुजरात “द्रुतगामी मार्ग” जैसा है, बुद्धदेव का बंगाल गतिअवरोधक समान है.

गुजरात की विकास दर सकल भारत की तुलना में ज्यादा है, बंगाल एक बन्द प्रदेश है.

नरेन्द्रभाई के गुजरात में लोग भूखे नहीं मरते, बुद्धदेव के बंगाल में खाने को लेकर दंगे होते है.

नरेन्द्रभाई विकास के नाम पर चुनाव लड़ते है, बुद्धदेव इसी मुद्दे पर लड़कर दिखाये.

गुजरात में मुसलमानों के पास हिन्दुओ से ज्यादा जमीन है, अन्य प्रांतों के मुकाबले ज्यादा समृद्ध है, बुद्धदेव के राज्य में उनकी आर्थिक स्थिती कैसी है? पता कर लो.

बाकि समानताएं तलाशनी हो तो गधे और ब्लॉगर में भी बहुत सी समानताएं है, तो दोनो एक है?

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Thursday, October 25, 2007

अपने ही घर में बेगानी हिन्दी

हाल ही में मुंबई में संपन्न विश्व स्तरीय सैनिक खेलों के आयोजन में 19 देशों के सैनिक मुंबई आए और यहाँ उन्होंने विभिन्न खेलों में भागीदारी की। खेलों के बाद जब भी अलग-अलग देशों के सैनिक खाने के दौरान या विश्राम के क्षणों में आपस में मिलते थे तो अपने ही देश की भाषा में बात करते थे, जबकि ऊँचे ओहदों पर बैठे भारतीय सेना के अधिकारी अंग्रेजी में बात करते थे। कई बार तो बाहर से आए सैनिक अधिकारियों ने यह जानने की भी कोशिश की कि भारत के सैनिकों की भाषा कौनसी है, मगर खिसियाए भारतीय अधिकारी कुछ जवाब नहीं दे पाते थे।

जयपुर के श्री दीपक महान 'दूरदर्शन की ओर से इन खेलों के सीधे प्रसारण का आँखों देखा हाल बताने के लिए मुंबई आए थे, इस दौरान उन्होंने जो कुछ महसूस किया उससे वे इतने व्यथित हुए कि अपनी पीड़ा यहाँ व्यक्त की है.

मूल लेख हिन्दी मीडिया पर छपा है, हिन्दी की व्यथा पर आपका ध्यानाकर्षण हेतू यहाँ लिंक दी गई है.

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Tuesday, September 25, 2007

बा मुलायजा होशियार

राजतीलक की तैयारी करें, भारत के अगले शासक ने सिंहासन की तरफ एक और कदम बढ़ा दिया है. महामंत्री बन गये है.

बात कर रहें है, आजाद भारत के प्रथम राजवंश की अगली पीढ़ी की. त्यागमूर्ति के पूत्र राहूल गाँधी की. लोकतंत्र है, जनता जिसे चाहें सिंहासन दे, हम कौन होते है कुढ़ने वाले?
अब हमारे बाप-दादाओं ने कहाँ उनके बाप-दादाओं की तरह देश की सेवा करते हुए गोलियाँ खायी, फाँसी पर झूल गए या काले पानी की सजा पायी. सेवा की है तो मेवा भी खाएंगे ही ना.

ऐसी ही सेवा गाँधीजी, सुभाषजी, भगतसिंहजी, सावरकरजी, मौलाना आजादजी, बिस्मिल्लाजी जैसे लोगो ने की होती तो उनके वंशज भी मेवा खा रहे होते. ना की बहादूरशाह जफ़र के वंशजो की तरह चाय का ठेला लगा रहे होते.

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Monday, September 24, 2007

इस्लामी कप ?!!!!

रोमांचक मैच, और भारत की जीत. जश्न के माहौल में सारा भारत डूब गया. धर्म, प्रांत, भाषा की दीवारें ढह सी गई. सचमुच भारतीयता जीत गई.

हार के बाद पाकिस्तानी कप्तान ने अपने देश से माफी माँगी साथ ही पूरी दुनिया के मुस्लिम-लीग से भी माफी माँगी. पाकिस्तान से माफी माँगना तो समझमें आता है मगर समग्र विश्व के मुस्लिम समुदाय से कैसी माफी? क्या यह कप भी “इस्लामिक-बम” की तरह “इस्लामिक कप” होता? क्या पाकिस्तान सारे मुसलमानों का झण्डाबदार है? किस हद दर्जे की कट्टरता और घटीया सोच की घूँटी पिलायी जाती है, इन्हे. इस प्रकार तो हमारे पठान बन्धू इस्लाम के अपराधी हो गए, जिन्होने देश के लिए पाकिस्तान की तरफ से इस्लाम को मिलने वाले जीत के तौहफे से वंचित रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई.

कहीं यही वजह तो नहीं जो कई जगह (आज के अखबारों की खबरों के अनुसार) जश्न मनाते लोगो पर पाकिस्तानी हार से खिन्नाये लोगो ने पत्थरबाजी की.

तब तो कहना ही होगा, धर्मनिरपेक्ष भारत की इस्लामी कट्टरता पर जीत हुई. मनाओ जश्न.

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Wednesday, September 19, 2007

परवेज भाई रामजी खतरे नहीं है.

अरे रे रे परवेज भाई ये क्या लिख दिया की “हां तो भाई राम जी एक फिर ख़तरे मे है।“ ना भाई ना. राम को खतरा ना है, खतरा तो रामसेतु को है।

एक बार 'बाबर' ने पंगा ले लिया था।
बाबर क्या खा कर राम से पंगा लेता भला। लाचार हारे हिन्दुओं को उनकी औकात बता दी थी, बस। हजारों मन्दिर ध्वस्त हुए, साथ में रामजी का मन्दिर भी ध्वस्त हो गया।

बाबर कि निशानी पर चढ़ कर उसे उसकी औकात बता दी।
बाबर की बर्बरता की निशानी कहो...ज्यादा सही रहेगा.

भगवा झंडे वालो ने हजारो देशद्रोहियों को उनकी औकात बतायी थी।
बुरा मत मानना, बात कुछ हजम नहीं हुई।

ये भूल गए कि इन्होने एक बार नारा दिया था कि" मंदिर वही बनायेंगे"।
धन्यवाद याद दिलाने के लिए। दम हुआ तो बना लेंगे।

ये फिर दुबारा राम को बचाने का ठेका ले रहे है।
रामजी को कौन बचा सकता है? ये तो बात सेतु की है जो हमारा कर्तव्य है, अपनी धरोहर बचाना। भारत में है तो हाथ-पैर मार रहे है। अफगान में होता तो क्या कर लेते?

" काठ कि हांडी बार बार नही चढती"
राम का नाम काठ की हांडी नहीं है, मुन्ना।

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Tuesday, September 4, 2007

माँ भारती की फक्कड़ आरती.

हजारों लोगों की भीड़ बेसब्री से एक बड़े से मंच के पास किसी का इंतज़ार कर रही है। मंच के आसपास से शंख, ढोल और तबले की आवाज के बीच खिचड़ी दाढ़ी वाला, लंबा सा कुरता पहने एक हाथ में माईक लिए और दूसरे हाथ में ब्रश लिए एक युवक आता है और भारत माता की जय का नारा लगाकर कविता पढ़ना शुरु करता है। उसके एक हाथ में माईक है और दूसरे हाथ में ब्रश है, वह पूरी ऊर्जा से अपनी कविता पढ़ रहा है और साथ में वह पलक झपकते ही महाराणा प्रताप, शहीद भगत सिंह, शिवाजी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, लोकमान्य तिलक जैसे वीर योध्दाओं के चित्र बनाता जाता है। कार्यक्रम का क्लाईमैक्स तब आता है जब वह युवक भारत माता का चित्र बनाता है।

इस युवक का नाम है सत्यनारायण मौर्य और इसके फक्कड़ रहन सहन की वज़ह से प्रशंसकों ने इसे 'बाबा' नाम दिया है। मध्यप्रदेश के राजगढ़ शहर का यह युवक अपनी चित्रकला की पढ़ाई के लिए जब गाँव से पहली बार उज्जैन जैसे बड़े शहर में पहुँचा था तो वहाँ उसके पास जेब खर्च तो दूर अपनी पढ़ाई पूरी करने तक के लिए पैसे नहीं थे मगर धुन के पक्के इस युवक ने वहाँ लोगों के साईन बोर्ड, बैनर और पोस्टर लिखकर और अपने से जूनियर छात्रों को पढ़ाकर अपनी पढ़ाई पूरी की और विक्रम विश्वविद्यालय से चित्रकला में स्वर्ण पदक भी प्राप्त किया। मगर आज यही युवक इस बात को गर्व से कहता है कि मैंने झूठी डिग्री हासिल करने के लिए झूठी पढ़ाई की, अगर मैं उस वक्त इस पढ़ाई का विरोध करता तो मुझे अनुत्तीर्ण कर दिया जाता। इस युवक को मैकाले की शिक्षा रास नहीं आई और लोगों को जागरुक बनाने के लिए उसने अपना खुद का माध्यम चुना-चित्रकला और कविता। आज इस फक्कड़ कवि ने दुनिया भर में अपनी पहचान बना ली है।

(यहाँ रमताजोगीजी के लेख का अंश लिया गया है. फक्कड़ बाबा के बारे में और अधिक यहाँ पर पढ़ सकते है. )

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Wednesday, July 11, 2007

अंकल, इतिहास पुरूष कैसे होते है?

अंकल अंकल ये हेस्टोरिकल परसन कैसे होते है?

बेटा, इतिहास पुरूष संवेदनशील, सम्मानित और बहुपक्षीय सोच वाले होते थे. मगर आने वाले युग पुरूष जरा अलग किस्म के होंगे.

ये कैसे होंगे अंकल?

बेटा अब इतिहास में उन्ही का नाम लिखा जाएगा, जो अपने आप को ही सही समझेंगे तथा दूसरों को गलत साबित करने में अपनी उर्जा लगा देंगे.

अभी पूरा क्लियर नहीं समझा अंकल, और गुड़-थिंग बताओ हेस्टोरिकल परसन की.

बेटा वे अपने जैसो के अलावा किसी को मनुष्य नहीं समझेंगे.

और अंकल

और वे गालियों को संस्कार मानेंगे.

और अंकल

और बेटा इनमें से कुछ किसी को मारने की धमकी देगें और कुछ उनका समर्थन करेंगे.

बस अंकल इतना ही काफी है. मैं समझ गया हमारे इतिहास पुरूष कैसे होंगे.

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